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भारतीय उपमहाद्वीप में पुरापाषाण काल

भारतीय इतिहास · Updated 13 Sep 2026· 10 min read
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Quick Summary

पुरापाषाण काल भारतीय उपमहाद्वीप के मानव प्रागैतिहास का सबसे प्रारंभिक और लंबा चरण था। पत्थर के औजार और पुरातात्विक स्थल बताते हैं कि शिकारी-संग्रहकर्ता समुदाय विभिन्न पर्यावरणों के अनुकूल कैसे रहे।

Table of Contents
  1. 1🪨 मानव प्रागैतिहास का सबसे प्रारंभिक चरण
  2. 2⛏️ पत्थर के औजार: सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण
  3. 3🗺️ भारतीय उपमहाद्वीप के प्रमुख पुरापाषाण क्षेत्र
  4. 4🌿 पुरापाषाण मानव का जीवन
  5. 5🔥 जलवायु, पर्यावरण और मानव अनुकूलन
  6. 6🧠 निम्न पुरापाषाण काल
  7. 7🔨 मध्य पुरापाषाण काल
  8. 8🔪 उच्च पुरापाषाण काल
  9. 9🔍 इस काल का इतिहास कैसे बनाया जाता है?
  10. 10📌 परीक्षा के लिए एक नजर में

🪨 मानव प्रागैतिहास का सबसे प्रारंभिक चरण

पुरापाषाण काल (Palaeolithic Age) भारतीय उपमहाद्वीप में मानव सांस्कृतिक विकास का सबसे प्रारंभिक चरण माना जाता है। Palaeolithic शब्द यूनानी भाषा के palaios, अर्थात 'पुराना', और lithos, अर्थात 'पत्थर', से बना है। इसलिए इसे पुराना पाषाण युग या Old Stone Age कहा जाता है।

इस काल से कोई लिखित अभिलेख उपलब्ध नहीं है। इसलिए पुरातत्वविद पुरापाषाण मानव के जीवन का पुनर्निर्माण मुख्यतः पत्थर के औजारों, पशु-अवशेषों, भूवैज्ञानिक परतों और मानव गतिविधियों के पुरातात्विक प्रमाणों से करते हैं। इनसे यह समझने में सहायता मिलती है कि प्रारंभिक मानव औजार कैसे बनाता था, भोजन कैसे प्राप्त करता था और अलग-अलग पर्यावरणों के अनुसार स्वयं को कैसे ढालता था।

पुरापाषाण काल अत्यंत लंबे समय तक चला। पूरे उपमहाद्वीप में इसकी शुरुआत और अलग-अलग चरणों की तिथियाँ बिल्कुल समान नहीं थीं। औजार बनाने की तकनीक में आए व्यापक बदलावों के आधार पर इसे निम्न, मध्य और उच्च पुरापाषाण में बाँटा जाता है।

⛏️ पत्थर के औजार: सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण

पुरापाषाण काल को समझने के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक प्रमाणों में पत्थर के औजार शामिल हैं। प्रारंभिक मानव उपयुक्त पत्थर चुनते थे और एक पत्थर से दूसरे पर प्रहार करके टुकड़े या फलक निकालते थे। इस प्रकार काटने, खुरचने तथा अन्य कार्यों के लिए उपयोगी धार तैयार की जा सकती थी।

समय के साथ औजार बनाने की तकनीक में परिवर्तन हुआ और इन्हीं परिवर्तनों से पुरातत्वविद विभिन्न पुरापाषाण संस्कृतियों और चरणों को पहचानते हैं।

  • निम्न पुरापाषाण: हस्तकुठार (handaxe) और विदारणी (cleaver) जैसे बड़े औजार महत्वपूर्ण थे। कुछ परंपराओं में चॉपर और चॉपिंग टूल भी मिलते हैं।
  • मध्य पुरापाषाण: फलक आधारित औजार अधिक प्रमुख हुए। स्क्रेपर और पॉइंट इनके महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
  • उच्च पुरापाषाण: ब्लेड और बुरिन जैसे अधिक विशिष्ट औजारों का महत्व बढ़ा।

इन चरणों को ऐसी कठोर समय-सीमाएँ नहीं समझना चाहिए जो पूरे उपमहाद्वीप में एक ही समय पर शुरू हुई हों। अलग-अलग क्षेत्रों में तकनीकी परिवर्तन अलग गति से हुए और पुरानी तथा नई औजार परंपराएँ कुछ समय तक साथ-साथ चल सकती थीं।

🗺️ भारतीय उपमहाद्वीप के प्रमुख पुरापाषाण क्षेत्र

पुरापाषाण काल के अवशेष भारतीय उपमहाद्वीप के अनेक भागों से मिले हैं। उनका व्यापक वितरण दिखाता है कि प्रारंभिक मानव केवल किसी एक नदी घाटी या क्षेत्र तक सीमित नहीं था।

उत्तर-पश्चिमी उपमहाद्वीप की सोहन या Soan/Sohan घाटी प्रारंभिक पाषाण औजार परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। प्रायद्वीपीय भारत में नर्मदा, गोदावरी और कृष्णा नदी प्रणालियों से जुड़े क्षेत्रों से भी पुरापाषाण प्रमाण प्राप्त हुए हैं। वर्तमान उत्तर प्रदेश की बेलन घाटी भी प्रागैतिहासिक पुरातत्व का महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

मध्य प्रदेश का भीमबेटका भारतीय प्रागैतिहास के सबसे प्रसिद्ध स्थलों में से एक है। इसके शैलाश्रयों में मानव गतिविधि की बहुत लंबी परंपरा के प्रमाण मिले हैं। भीमबेटका अपने शैलचित्रों के लिए भी प्रसिद्ध है, लेकिन वहाँ के सभी चित्र एक ही काल के नहीं हैं। इसलिए पुरापाषाण निवास का प्रमाण मिलने का अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक शैलचित्र पुरापाषाण काल का है।

🌿 पुरापाषाण मानव का जीवन

पुरापाषाण समुदायों का जीवन मुख्यतः शिकार और खाद्य-संग्रह पर आधारित था। वे कृषि के बजाय प्रकृति में उपलब्ध जंगली पौधों, फलों, कंद-मूल, बीजों और पशुओं से भोजन प्राप्त करते थे।

पानी, भोजन, पशुओं और औजार बनाने योग्य पत्थर की उपलब्धता इस बात को प्रभावित करती थी कि लोग कहाँ ठहरेंगे। इसी कारण नदियों और अन्य जलस्रोतों का विशेष महत्व था।

पुरापाषाण समूह सामान्यतः गतिशील थे क्योंकि संसाधनों की उपलब्धता मौसम और पर्यावरण के साथ बदल सकती थी। लेकिन इसका अर्थ बिना उद्देश्य लगातार भटकना नहीं था। अनुकूल स्थानों पर समूह बार-बार लौट सकते थे और शैलाश्रय, नदी-तट तथा खुले स्थल अस्थायी या बार-बार उपयोग किए जाने वाले निवास बन सकते थे।

कृषि, स्थायी खेती और खाद्य उत्पादन बाद के विकास थे। इसीलिए पुरापाषाण की food gathering अर्थव्यवस्था और बाद के नवपाषाण काल की food production अर्थव्यवस्था के बीच अंतर परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

🔥 जलवायु, पर्यावरण और मानव अनुकूलन

पुरापाषाण काल का बड़ा हिस्सा प्लीस्टोसीन (Pleistocene) युग से जुड़ा था। इस लंबे समय में तापमान, वर्षा, वनस्पति और पशु-जगत में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इन बदलावों ने भोजन की उपलब्धता, मानव आवागमन और निवास के स्थानों को प्रभावित किया।

प्रारंभिक मानव को इन परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को लगातार ढालना पड़ता था। किस प्रकार का पत्थर चुना गया, कौन-से औजार बनाए गए और कहाँ निवास किया गया—इन सबमें मानव और पर्यावरण का संबंध दिखाई देता है।

मानव प्रागैतिहास में आग का उपयोग भी महत्वपूर्ण विकास था। आग गर्मी और सुरक्षा दे सकती थी तथा भोजन के प्रसंस्करण में उपयोगी हो सकती थी। फिर भी भारत में किसी विशेष स्थल पर नियंत्रित आग के सबसे पहले उपयोग की निश्चित तारीख बताने के लिए ठोस पुरातात्विक प्रमाण आवश्यक हैं। इसलिए ऐसे दावों को सावधानी से देखना चाहिए।

🧠 निम्न पुरापाषाण काल

निम्न पुरापाषाण तीनों व्यापक चरणों में सबसे प्रारंभिक और सबसे लंबा था। इस चरण में बड़े पत्थर के औजार विशेष रूप से महत्वपूर्ण थे। हस्तकुठार को सामान्यतः दोनों ओर से तराशकर उपयोगी धार दी जाती थी, जबकि विदारणी में चौड़ी काटने वाली धार महत्वपूर्ण होती थी।

चॉपर और चॉपिंग टूल परंपराएँ भी कुछ क्षेत्रों में महत्वपूर्ण थीं। अलग-अलग औजार परंपराओं की मौजूदगी दिखाती है कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में पुरापाषाण तकनीक एक जैसी नहीं थी।

🔨 मध्य पुरापाषाण काल

मध्य पुरापाषाण में फलक आधारित तकनीक का महत्व बढ़ा। बड़े core tools पर मुख्य निर्भरता के बजाय पत्थर से निकाले गए फलक को आकार देकर अपेक्षाकृत छोटे और विशिष्ट औजार बनाए गए।

स्क्रेपर और पॉइंट इसके महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। यह परिवर्तन पत्थर के औजार बनाने की प्रक्रिया पर बढ़ते तकनीकी नियंत्रण का संकेत देता है, लेकिन इसे पूरे उपमहाद्वीप में एक साथ हुई अचानक क्रांति नहीं समझना चाहिए।

🔪 उच्च पुरापाषाण काल

उच्च पुरापाषाण में ब्लेड और बुरिन जैसे अधिक विशिष्ट औजारों का महत्व बढ़ा। ब्लेड सामान्यतः लंबा और अपेक्षाकृत संकरा फलक होता है, जबकि बुरिन विशेष प्रकार की कार्यकारी धार वाला औजार होता है।

ये तकनीकी परिवर्तन प्रागैतिहासिक मानव की औजार-निर्माण क्षमता में लंबे समय से चल रहे विकास का हिस्सा थे। इसके बाद मध्यपाषाण काल में सूक्ष्म पाषाण औजारों या microliths का महत्व विशेष रूप से बढ़ा।

🔍 इस काल का इतिहास कैसे बनाया जाता है?

पुरापाषाण मानव ने कोई लिखित दस्तावेज नहीं छोड़ा। इसलिए इस काल का इतिहास मुख्यतः पुरातात्विक प्रमाणों से बनाया जाता है। किसी पत्थर के औजार का महत्व केवल उसकी आकृति में नहीं, बल्कि इस बात में भी है कि वह कहाँ मिला, किस भू-परत में मिला और उसके साथ कौन-से अन्य अवशेष मिले

पुरातत्वविद भू-परतों, भूवैज्ञानिक जमाव और जहाँ उपयुक्त हो वहाँ वैज्ञानिक डेटिंग विधियों का उपयोग करके कालक्रम समझने का प्रयास करते हैं। बहुत प्राचीन काल की डेटिंग जटिल होती है और नई खोजों या बेहतर वैज्ञानिक तकनीकों से पहले स्वीकार की गई तिथियों में संशोधन हो सकता है।

इसलिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में किसी एक कठोर तारीख की तुलना में निम्न → मध्य → उच्च पुरापाषाण के व्यापक तकनीकी क्रम को समझना अधिक उपयोगी है।

📌 परीक्षा के लिए एक नजर में

  • पुरापाषाण का अर्थ पुराना पाषाण युग है।
  • इसे व्यापक रूप से निम्न, मध्य और उच्च पुरापाषाण में बाँटा जाता है।
  • निम्न पुरापाषाण: हस्तकुठार, विदारणी तथा चॉपर-चॉपिंग परंपराएँ महत्वपूर्ण।
  • मध्य पुरापाषाण: स्क्रेपर और पॉइंट जैसे फलक आधारित औजार प्रमुख हुए।
  • उच्च पुरापाषाण: ब्लेड और बुरिन का महत्व बढ़ा।
  • जीवन-निर्वाह मुख्यतः शिकार और खाद्य-संग्रह पर आधारित था।
  • कृषि और स्थायी खेती वाले गाँव पुरापाषाण अर्थव्यवस्था का आधार नहीं थे।
  • भीमबेटका लंबे प्रागैतिहासिक मानव निवास के प्रमाणों के लिए महत्वपूर्ण है।
  • सोहन घाटी प्रारंभिक पाषाण औजार परंपराओं का महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
  • लिखित अभिलेख न होने के कारण पुरातत्व इस काल को समझने का प्रमुख आधार है।

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पुरापाषाण (Palaeolithic) का शाब्दिक अर्थ किस युग से है?
  • A. नव पाषाण युग
  • B. पुराना पाषाण युग
  • C. ताम्र-पाषाण युग
  • D. लौह युग

Palaeolithic का अर्थ 'पुराना पत्थर' है। इसलिए इसे पुराना पाषाण युग या Old Stone Age कहा जाता है।

निम्न पुरापाषाण काल से विशेष रूप से कौन-से औजार जुड़े हैं?
  • A. हस्तकुठार और विदारणी
  • B. पॉलिश की हुई पत्थर की कुल्हाड़ियाँ और हँसिए
  • C. लोहे के हल और तलवारें
  • D. तांबे की कुल्हाड़ियाँ और कांस्य दर्पण

हस्तकुठार और विदारणी जैसे बड़े पत्थर के औजार निम्न पुरापाषाण की प्रमुख औजार परंपराओं में शामिल हैं।

पुरापाषाण समुदायों की मुख्य जीवन-निर्वाह पद्धति क्या थी?
  • A. स्थायी कृषि
  • B. नगरीय व्यापार
  • C. शिकार और खाद्य-संग्रह
  • D. बागान कृषि

पुरापाषाण समुदाय मुख्यतः प्राकृतिक रूप से उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर थे और शिकार तथा खाद्य-संग्रह से भोजन प्राप्त करते थे।

मध्य पुरापाषाण काल में कौन-सी औजार तकनीक अधिक प्रमुख हुई?
  • A. लौह गलाना
  • B. चाक पर बने मिट्टी के बर्तन
  • C. पॉलिश की हुई पत्थर की कुल्हाड़ियाँ
  • D. स्क्रेपर और पॉइंट जैसे फलक-आधारित औजार

मध्य पुरापाषाण में फलक से बनाए गए अपेक्षाकृत छोटे औजारों, विशेषकर स्क्रेपर और पॉइंट, का महत्व बढ़ा।

भारतीय प्रागैतिहास के अध्ययन में भीमबेटका क्यों महत्वपूर्ण है?
  • A. यहाँ अशोक का सबसे प्राचीन अभिलेख मिला है
  • B. इसके शैलाश्रयों में लंबे प्रागैतिहासिक मानव निवास के प्रमाण मिले हैं
  • C. यह हड़प्पा सभ्यता की राजधानी थी
  • D. यहाँ सबसे प्राचीन वैदिक पांडुलिपियाँ मिली हैं

भीमबेटका के शैलाश्रयों में मानव गतिविधि और निवास की लंबी प्रागैतिहासिक परंपरा के प्रमाण मिले हैं।

भारतीय उपमहाद्वीप में पुरापाषाण कालक्रम के बारे में कौन-सा कथन सबसे सही है?
  • A. इसके चरण व्यापक पुरातात्विक-तकनीकी विभाजन हैं और उनकी तिथियाँ क्षेत्र के अनुसार बदल सकती हैं
  • B. सभी चरण पूरे उपमहाद्वीप में बिल्कुल एक ही तारीख को शुरू हुए
  • C. पुरापाषाण काल कृषि के विकास के बाद शुरू हुआ
  • D. इसका कालक्रम मुख्यतः राजकीय अभिलेखों से ज्ञात होता है

निम्न, मध्य और उच्च पुरापाषाण व्यापक पुरातात्विक तथा तकनीकी चरण हैं और उनकी काल-सीमाएँ अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकती हैं।

पुरापाषाण काल के चरणों में औजार तकनीक के व्यापक परिवर्तन का सही क्रम कौन-सा है?
  • A. लौह औजार → तांबे के औजार → हस्तकुठार
  • B. पॉलिश कुल्हाड़ियाँ → हस्तकुठार → कांस्य औजार
  • C. हस्तकुठार-विदारणी परंपरा → फलक औजार → ब्लेड और बुरिन परंपरा
  • D. सूक्ष्म पाषाण → लोहे के हल → हस्तकुठार

व्यापक तकनीकी क्रम में निम्न पुरापाषाण में हस्तकुठार-विदारणी, मध्य पुरापाषाण में फलक आधारित औजार और उच्च पुरापाषाण में ब्लेड तथा बुरिन अधिक प्रमुख दिखाई देते हैं।

भीमबेटका के सभी शैलचित्रों को स्वतः पुरापाषाण काल का क्यों नहीं मानना चाहिए?
  • A. क्योंकि भीमबेटका में केवल लौह युग में लोग रहे थे
  • B. क्योंकि सभी चित्र आधुनिक प्रतिकृतियाँ हैं
  • C. क्योंकि पुरापाषाण मानव शैलाश्रयों का उपयोग नहीं करते थे
  • D. क्योंकि यहाँ मानव गतिविधि का लंबा कालक्रम है और चित्र अलग-अलग कालों से संबंधित हैं

भीमबेटका में मानव गतिविधि की लंबी परंपरा के प्रमाण हैं और वहाँ के शैलचित्र अलग-अलग कालों में बने। इसलिए हर चित्र को पुरापाषाण काल का नहीं माना जा सकता।

लिखित अभिलेखों से रहित किसी क्षेत्र के पुरापाषाण जीवन के पुनर्निर्माण के लिए कौन-सा प्रमाण सबसे प्रत्यक्ष रूप से उपयोगी होगा?
  • A. मध्यकालीन दरबारी इतिहास
  • B. सुरक्षित पुरातात्विक परतों से प्राप्त पत्थर के औजारों का समूह
  • C. किसी प्राचीन राजा से जुड़ी आधुनिक लोककथा
  • D. औपनिवेशिक प्रशासनिक रिपोर्ट

पुरापाषाण समाजों के लिखित अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए सुरक्षित पुरातात्विक संदर्भ से मिले पत्थर के औजार उनकी तकनीक और गतिविधियों के प्रत्यक्ष भौतिक प्रमाण देते हैं।

पुरापाषाण जीवन-निर्वाह और बाद के नवपाषाण जीवन में सबसे महत्वपूर्ण अंतर कौन-सा था?
  • A. पुरापाषाण लोग मुख्यतः लोहे के औजार और नवपाषाण लोग पत्थर के औजार उपयोग करते थे
  • B. पुरापाषाण लोग मुख्यतः नगरों में रहते थे जबकि नवपाषाण लोगों ने बस्तियाँ छोड़ दी थीं
  • C. पुरापाषाण जीवन मुख्यतः शिकार और खाद्य-संग्रह पर आधारित था, जबकि नवपाषाण में खाद्य उत्पादन महत्वपूर्ण हुआ
  • D. पुरापाषाण समुदाय लेखन जानते थे जबकि नवपाषाण समुदाय नहीं जानते थे

पुरापाषाण अर्थव्यवस्था मुख्यतः प्रकृति से उपलब्ध भोजन प्राप्त करने पर आधारित थी। बाद के नवपाषाण काल में कृषि और पशुपालन के साथ खाद्य उत्पादन महत्वपूर्ण हुआ।